बुद्ध अपने प्रवचनों में उनके शिष्यों को बहुत सी कथाएं सुनाते थे. यह कथा भी उन्हीं में से एक है.
कभी किसी काल में किसी नगर में दो धनी व्यापारी रहते थे. वे दोनों ही अपने धन और वैभव का बड़ा प्रदर्शन करते थे. सुविधा के लिए हम उनके नाम ‘क’ और ‘ख’ रख लेते हैं.
एक दिन व्यापारी ‘क’ अपने मित्र ‘ख’ के घर उससे भेंट करने के लिए गया. ‘क’ ने देखा कि ‘ख’ का घर बहुत विशाल और तीन मंजिला था. 2,500 साल पहले तीन मंजिला घर होना बड़ी बात थी और उसे बनाने के लिए बहुत धन और कुशल वास्तुकार की आवश्यकता होती थी. ‘क’ ने यह भी देखा कि नगर में सभी निवासी ‘ख’ के घर को बड़े विस्मय से देखते थे और उसकी बहुत बड़ाई करते थे.
अपने घर वापसी पर ‘क’ बहुत उदास था कि ‘ख’ के घर ने सभी का ध्यान खींच लिया था. उसने उसी वास्तुकार को बुलवाया जिसने ‘ख’ का घर बनाया था. उसने वास्तुकार से ‘ख’ के घर जैसा ही तीन मंजिला घर बनाने को कहा. वास्तुकार ने इस काम के लिए हामी भर दी और काम शुरू हो गया.
कुछ दिनों बाद ‘क’ काम का मुआयना करने के लिए निर्माणस्थल पर गया. जब उसने नींव खोदे जाने के लिए मजदूरों को गहरा गड्ढा खोदते देखा तो वास्तुकार को बुलाया और पूछा कि इतना गहरा गड्ढा क्यों खोदा जा रहा है.
“मैं आपके बताये अनुसार तीन मंजिला घर बनाने के लिए काम कर रहा हूँ”, वास्तुकार ने कहा, “सबसे पहले मैं मजबूत नींव बनाऊँगा, फिर क्रमशः पहली मंजिल, दूसरी मंजिल और तीसरी मंजिल बनाऊंगा.”
“मुझे इस सबसे कोई मतलब नहीं है!”, ‘क’ ने कहा, “तुम सीधे ही तीसरी मंजिल बनाओ और उतनी ही ऊंची बनाओ जितनी ऊंची तुमने ‘ख’ के लिए बनाई थी. नींव की और बाकी मंजिलों की परवाह मत करो!”
“ऐसा तो नहीं हो सकता”, वास्तुकार ने कहा.
“ठीक है, यदि तुम यह नहीं करोगे तो मैं किसी और से करवा लूँगा”, ‘क’ ने नाराज़ होकर कहा.
उस नगर में कोई भी वास्तुकार नींव के बिना वह घर नहीं बना सकता था, फलतः वह घर कभी न बन पाया.
सोमवार, 29 अगस्त 2011
आंखें खुली हों, तो पूरा जीवन ही विद्यालय है. और जिसे सीखने की भूख है, वह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक घटना से सीख लेता है. और स्मरण रहे कि जो इस भांति नहीं सीखता है, वह जीवन में कुछ भी नहीं सीख पाता. इमर्सन ने कहा है : ”हर शख्स, जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझ से बढ़कर है. वही, मैं उससे सीखता हूं.”
एक दृश्य मुझे स्मरण आता है. मक्का की बात है. एक नाई किसी के बाल बना रहा था. उसी समय फकीर जुन्नैद वहां आ गये और उन्होंने कहा : ”खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दें.” उस नाई ने खुदा का नाम सुनते ही अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा, ‘मित्र, अब थोड़ी मैं आपकी हजामत नहीं बना सकूंगा. खुदा की खातिर उस फकीर की सेवा मुझे पहले करनी चाहिये. खुदा का काम सबसे पहले है.’ इसके बाद फकीर की हजामत उसने बड़े ही प्रेम और भक्ति से बनाई और उसे नमस्कार कर विदा किया. कुछ दिनों बाद जब जुन्नैद को किसी ने कुछ पैसे भेंट किये, तो वे उन्हें नाई को देने गये. लेकिन उस नाई ने पैसे न लिये और कहा : ”आपको शर्म नहीं आती? आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने को कहा था, रुपयों की खातिर नहीं!” फिर तो जीवन भर फकीर जुन्नैद अपनी मंडली में कहा करते थे, ”निष्काम ईश्वर-भक्ति मैंने हज्जाम से सीखी है.”
क्षुद्रतम् में भी विराट संदेश छुपे हैं. जो उन्हें उघाड़ना जानता है, वह ज्ञान को उपलब्ध होता है. जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है. और, जो मूर्छित बने रहते हें, वे द्वार आये आलोक को भी वापस लौटा देते हैं.
ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.
http://hindizen.com/
एक दृश्य मुझे स्मरण आता है. मक्का की बात है. एक नाई किसी के बाल बना रहा था. उसी समय फकीर जुन्नैद वहां आ गये और उन्होंने कहा : ”खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दें.” उस नाई ने खुदा का नाम सुनते ही अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा, ‘मित्र, अब थोड़ी मैं आपकी हजामत नहीं बना सकूंगा. खुदा की खातिर उस फकीर की सेवा मुझे पहले करनी चाहिये. खुदा का काम सबसे पहले है.’ इसके बाद फकीर की हजामत उसने बड़े ही प्रेम और भक्ति से बनाई और उसे नमस्कार कर विदा किया. कुछ दिनों बाद जब जुन्नैद को किसी ने कुछ पैसे भेंट किये, तो वे उन्हें नाई को देने गये. लेकिन उस नाई ने पैसे न लिये और कहा : ”आपको शर्म नहीं आती? आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने को कहा था, रुपयों की खातिर नहीं!” फिर तो जीवन भर फकीर जुन्नैद अपनी मंडली में कहा करते थे, ”निष्काम ईश्वर-भक्ति मैंने हज्जाम से सीखी है.”
क्षुद्रतम् में भी विराट संदेश छुपे हैं. जो उन्हें उघाड़ना जानता है, वह ज्ञान को उपलब्ध होता है. जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है. और, जो मूर्छित बने रहते हें, वे द्वार आये आलोक को भी वापस लौटा देते हैं.
ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.
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(आज मैं आपको लेव तॉल्स्तॉय की एक लघुकथा सुनाता हूँ. यह कहानी उस राजा की है जो अपने तीन प्रश्नों के उत्तर खोज रहा था.)
तो, एक बार एक राजा के मन में आया कि यदि वह इन तीन प्रश्नों के उत्तर खोज लेगा तो उसे कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी.
पहला प्रश्न: किसी भी कार्य को करने का सबसे उपयुक्त कौन सा है?
दूसरा प्रश्न: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है?
तीसरा प्रश्न: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?
राजा ने यह घोषणा करवाई कि जो भी व्यक्ति उपरोक्त प्रश्नों के सही उत्तर देगा उसे बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा. यह सुनकर बहुत से लोग राजमहल गए और सभी ने अलग-अलग उत्तर दिए. पहले प्रश्न के उत्तर में एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को एक समय तालिका बनाना चाहिए और उसमें हर कार्य के लिए एक निश्चित समय नियत कर देना चाहिए तभी हर काम अपने सही समय पर हो पायेगा. दूसरे व्यक्ति ने राजा से कहा कि सभी कार्यों को करने का अग्रिम निर्णय कर लेना उचित नहीं होगा और राजा को चाहिए कि वह मनविलास के सभी कार्यों को तिलांजलि देकर हर कार्य को व्यवस्थित रूप से करने की ओर अपना पूरा ध्यान लगाये.
किसी और ने कहा कि राजा के लिए यह असंभव है कि वह हर कार्य को दूरदर्शिता पूर्वक कर सके. इसलिए राजा को विज्ञजनों की एक समिति का निर्माण करना चाहिए जो हर विषय को परखने के बाद राजा को यह बताये कि उसे कब क्या करना है. फिर किसी और ने यह कहा कि कुछ मामलों में त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं और परामर्श के लिए समय नहीं होता लेकिन ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की सहायता से राजा यदि चाहे तो किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा सकता है.
दूसरे प्रश्न के उत्तर के लिए भी कोई सहमति नहीं बनी. एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को प्रशासकों में अपना पूरा विश्वास रखना चाहिए. दूसरे ने राजा से पुरोहितों और संन्यासियों में आस्था रखने के लिए कहा. किसी और ने कहा कि चिकित्सकों पर सदैव ही भरोसा रखना चाहिए तो किसी ने योद्धाओं पर विश्वास करने के लिए कहा.
तीसरे प्रश्न के जवाब में भी विविध उत्तर मिले. किसी ने कहा कि विज्ञान का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है तो किसी ने धर्मग्रंथों के पारायण को सर्वश्रेष्ठ कहा. किसी और ने कहा कि सैनिक कौशल में निपुणता होना ही सबसे ज़रूरी है.
राजा को इन उत्तरों में से कोई भी ठीक नहीं लगा इसलिए किसी को भी पुरस्कार नहीं दिया गया. कुछ दिन तक चिंतन-मनन करने के बाद राजा ने एक महात्मा के दर्शन का निश्चय किया. वह महात्मा एक पर्वत के ऊपर बनी कुटिया में रहते थे और सभी उन्हें परमज्ञानी मानते थे.
राजा को यह पता चला कि महात्मा पर्वत से नीचे कभी नहीं आते और राजसी व्यक्तियों से नहीं मिलते थे. इसलिए राजा ने साधारण किसान का वेश धारण किया और अपने सेवक से कहा कि वह पर्वत की तलहटी पर लौटने का इंतज़ार करे. फिर राजा महात्मा की कुटिया की ओर चल दिया.
महात्मा की कुटिया तक पहुँचने पर राजा ने देखा कि वे अपनी कुटिया के सामने बने छोटे से बगीचे में फावड़े से खुदाई कर रहे थे. महात्मा ने राजा को देखकर सर हिलाया और खुदाई करते रहे. बगीचे में काम करना उनके लिए वाकई कुछ कठिन था, वे वृद्ध हो चले थे. हांफते हुए वे जमीन पर फावड़ा चला रहे थे.
राजा महात्मा तक पहुंचा और बोला, “मैं आपसे तीन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता हूँ. पहला: किसी भी कार्य को करने का सबसे अच्छा समय क्या है? दूसरा: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है? तीसरा: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?
महात्मा ने राजा की बात ध्यान से सुनी और उसके कंधे को थपथपाया और खुदाई करते रहे. राजा ने कहा, “आप थक गए होंगे. लाइए, मैं आपका हाथ बंटा देता हूँ.” महात्मा ने धन्यवाद देकर राजा को फावड़ा दे दिया और एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए बैठ गए.
दो क्यारियाँ खोदने के बाद राजा महात्मा की ओर मुड़ा और उसने फिर से वे तीनों प्रश्न दोहराए. महात्मा ने राजा के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया और उठते हुए कहा, “अब तुम थोड़ी देर आराम करो और मैं बगीचे में काम करूंगा.” लेकिन राजा ने खुदाई करना जारी रखा. एक घंटा बीत गया, फिर दो घंटे. शाम हो गयी. राजा ने फावड़ा रख दिया और महात्मा से कहा, “मैं यहाँ आपसे तीन प्रश्नों के उत्तर पूछने आया था पर आपने मुझे कुछ नहीं बताया. कृपया मेरी सहायता करें ताकि मैं समय से अपने घर जा सकूं.”
महात्मा ने राजा से कहा, “क्या तुम्हें किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही है?”. राजा ने आवाज़ की दिशा में सर घुमाया. दोनों ने पेड़ों के झुरमुट से एक आदमी को उनकी ओर भागते आते देखा. वह अपने पेट में लगे घाव को अपने हाथ से दबाये हुए था. घाव से बहुत खून बह रहा था. वह दोनों के पास आकर धरती पर गिर गया और अचेत हो गया. राजा और महात्मा ने देखा कि उसके पेट में किसी शस्त्र से गहरा वार किया गया था.राजा ने फ़ौरन उसके घाव को साफ़ किया और अपने वस्त्र को फाड़कर उसके घाव पर बाँधा ताकि खून बहना बंद हो जाए. कपड़े का वह टुकड़ा जल्द ही खून से पूरी तरह तर हो गया तो राजा ने उसके ऊपर दूसरा कपडा बाँधा और ऐसा तब तक किया जब तक खून बहना रुक नहीं गया.
कुछ समय बाद घायल व्यक्ति को होश आया और उसने पानी माँगा. राजा कुटिया तक दौड़कर गया और उसके लिए पानी लाया. सूरज अस्त हो चुका था और वातावरण में ठंडक आने लगी. राजा और महात्मा ने घायल व्यक्ति को उठाया और कुटिया के अन्दर बिस्तर पर लिटा दिया. वह आँखें बंद करके चुपचाप लेटा रहा. राजा भी पहाड़ चढ़ने और बगीचे में काम करने के बाद थक चला था. वह कुटिया के द्वार पर बैठ गया और उसे नींद आ गयी. सुबह जब उसकी आँख खुली तब सूर्योदय हो चला था और पर्वत पर दिव्य आलोक फैला हुआ था.
एक पल को वह भूल ही गया कि वह कहाँ है और वहां क्यों आया था. उसने कुटिया के भीतर बिस्तर पर दृष्टि डाली. घायल व्यक्ति अपने चारों ओर विस्मय से देख रहा था. जब उसने राजा को देखा तो बहुत महीन स्वर में बुदबुदाते हुए कहा, “मुझे क्षमा कर दीजिये”.
“लेकिन तुमने क्या किया है और मुझसे क्षमा क्यों मांग रहे हो”, राजा ने उससे पूछा.
“आप मुझे नहीं जानते पर मैं आपको जानता हूँ. मैंने आपका वध करने की प्रतिज्ञा ली थी क्योंकि पिछले युद्ध में आपने मेरे राज्य पर हमला करके मेरे बंधु-बांधवों को मार डाला और मेरी संपत्ति हथिया ली. जब मुझे पता चला कि आप इस पर्वत पर महात्मा से मिलने के लिए अकेले आ रहे हैं तो मैंने आपकी हत्या करने की योजना बनाई. मैं छुपकर आपके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था पर आपके सेवक ने मुझे देख लिया. वह मुझे पहचान गया और उसने मुझपर प्रहार किया. मैं अपने बचाव के लिए भागता हुआ यहाँ आ गया और आपके सामने गिर पड़ा. मैं आपकी हत्या को उद्यत था पर आपने मेरे जीवन की रक्षा की. मैं बहुत शर्मिंदा हूँ. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपके उपकार का मोल कैसे चुकाऊँगा. मैं जीवनपर्यंत आपकी सेवा करूंगा और मेरी संतानें भी सदैव आपके कुल की सेवा करेंगीं. कृपया मुझे क्षमा कर दें”.
राजा यह जानकर बहुत हर्षित हुआ कि प्रकार उसके शत्रु का रूपांतरण हो गया. उसने न केवल उसे क्षमा कर दिया बल्कि उसकी संपत्ति लौटाने का वचन भी दिया और उसकी चिकित्सा के लिए अपने सेवक के मार्फ़त अपने निजी चिकित्सक को बुलावा भेजा. सेवक को निर्देश देने के बाद राजा महात्मा के पास अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पुनः आया. उसने देखा, महात्मा पिछले दिन खोदी गयी क्यारियों में बीज बो रहे थे.
महात्मा ने उठकर राजा से कहा, “आपके प्रश्नों के उत्तर तो पहले ही दिए जा चुके हैं.”
“वह कैसे?”, राजा ने चकित होकर कहा.
“कल यदि आप मेरी वृद्धावस्था का ध्यान करके बगीचे में कार्य करने में मेरी सहायता नहीं करते तो आप वापसी में घात लगाकर बैठे हुए शत्रु का शिकार बन जाते. तब आपको यह खेद होता कि आपको मेरे समीप अधिक समय व्यतीत करना चाहिए था. अतः आपका कल बगीचे में कार्य करने का समय ही सबसे उपयुक्त था. आप जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिले वह मैं ही था. और आपका सबसे आवश्यक कार्य था मेरी सहायता करना. बाद में जब घायल व्यक्ति यहाँ चला आया तब सबसे महत्वपूर्ण समय वह था जब आपने उसके घाव को भलीप्रकार बांधा. यदि आप ऐसा नहीं करते तो रक्तस्त्राव के कारण उसकी मृत्यु हो जाती. तब आपके और उसके मध्य मेल-मिलाप नहीं हो पाता. अतः उस क्षण वह व्यक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण था और उसकी सेवा-सुश्रुषा करना सबसे आवश्यक कार्य था.”
“स्मरण रहे, केवल एक ही समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और वह समय यही है, इस क्षण में है. इसी क्षण की सत्ता है, इसी का प्रभुत्व है. सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही है जो आपके समीप है, आपके समक्ष है, क्योंकि हम नहीं जानते कि अगले क्षण हम किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने के लिए जीवित रहेंगे भी या नहीं. और सबसे आवश्यक कार्य यह है कि आपके समीप आपके समक्ष उपस्थित व्यक्ति के जीवन को सुख-शांतिपूर्ण करने के प्रयास किये जाएँ क्योंकि यही मानवजीवन का उद्देश्य है.”
कितना अच्छा होता यदि तॉल्स्तॉय की यह कथा हमारे सभी धर्मग्रंथों में होती. इसमें अपार पवित्रता है. इसमें जनसेवा और पुरुषार्थ का सन्देश है. यह बताती है कि सभी प्राणियों का हितचिंतन ही मानव जीवन का उद्देश्य है. यह किसी देवता की उपासना या पद्धति के अनुपालन की बात नहीं करती. हम सर्वत्र शांति की बातें करते नहीं थकते पर यह भूल जाते हैं कि हम इस ध्येय की प्राप्ति तभी कर सकते हैं जब हमारे सबसे निकट उपस्थित मनुष्यों के जीवन में प्रसन्नता का समावेश हो. यदि हम अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, और परिजनों का जीवन ही नहीं संवारेंगे तो समाज का हित कैसे साध सकते हैं? यदि हमारी संतान ही बिलख रहीं हो तो दूसरों के आंसू पोंछने में कैसा गौरव? – तिक न्यात हन्ह
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तो, एक बार एक राजा के मन में आया कि यदि वह इन तीन प्रश्नों के उत्तर खोज लेगा तो उसे कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी.
पहला प्रश्न: किसी भी कार्य को करने का सबसे उपयुक्त कौन सा है?
दूसरा प्रश्न: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है?
तीसरा प्रश्न: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?
राजा ने यह घोषणा करवाई कि जो भी व्यक्ति उपरोक्त प्रश्नों के सही उत्तर देगा उसे बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा. यह सुनकर बहुत से लोग राजमहल गए और सभी ने अलग-अलग उत्तर दिए. पहले प्रश्न के उत्तर में एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को एक समय तालिका बनाना चाहिए और उसमें हर कार्य के लिए एक निश्चित समय नियत कर देना चाहिए तभी हर काम अपने सही समय पर हो पायेगा. दूसरे व्यक्ति ने राजा से कहा कि सभी कार्यों को करने का अग्रिम निर्णय कर लेना उचित नहीं होगा और राजा को चाहिए कि वह मनविलास के सभी कार्यों को तिलांजलि देकर हर कार्य को व्यवस्थित रूप से करने की ओर अपना पूरा ध्यान लगाये.
किसी और ने कहा कि राजा के लिए यह असंभव है कि वह हर कार्य को दूरदर्शिता पूर्वक कर सके. इसलिए राजा को विज्ञजनों की एक समिति का निर्माण करना चाहिए जो हर विषय को परखने के बाद राजा को यह बताये कि उसे कब क्या करना है. फिर किसी और ने यह कहा कि कुछ मामलों में त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं और परामर्श के लिए समय नहीं होता लेकिन ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओं की सहायता से राजा यदि चाहे तो किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा सकता है.
दूसरे प्रश्न के उत्तर के लिए भी कोई सहमति नहीं बनी. एक व्यक्ति ने कहा कि राजा को प्रशासकों में अपना पूरा विश्वास रखना चाहिए. दूसरे ने राजा से पुरोहितों और संन्यासियों में आस्था रखने के लिए कहा. किसी और ने कहा कि चिकित्सकों पर सदैव ही भरोसा रखना चाहिए तो किसी ने योद्धाओं पर विश्वास करने के लिए कहा.
तीसरे प्रश्न के जवाब में भी विविध उत्तर मिले. किसी ने कहा कि विज्ञान का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है तो किसी ने धर्मग्रंथों के पारायण को सर्वश्रेष्ठ कहा. किसी और ने कहा कि सैनिक कौशल में निपुणता होना ही सबसे ज़रूरी है.
राजा को इन उत्तरों में से कोई भी ठीक नहीं लगा इसलिए किसी को भी पुरस्कार नहीं दिया गया. कुछ दिन तक चिंतन-मनन करने के बाद राजा ने एक महात्मा के दर्शन का निश्चय किया. वह महात्मा एक पर्वत के ऊपर बनी कुटिया में रहते थे और सभी उन्हें परमज्ञानी मानते थे.
राजा को यह पता चला कि महात्मा पर्वत से नीचे कभी नहीं आते और राजसी व्यक्तियों से नहीं मिलते थे. इसलिए राजा ने साधारण किसान का वेश धारण किया और अपने सेवक से कहा कि वह पर्वत की तलहटी पर लौटने का इंतज़ार करे. फिर राजा महात्मा की कुटिया की ओर चल दिया.
महात्मा की कुटिया तक पहुँचने पर राजा ने देखा कि वे अपनी कुटिया के सामने बने छोटे से बगीचे में फावड़े से खुदाई कर रहे थे. महात्मा ने राजा को देखकर सर हिलाया और खुदाई करते रहे. बगीचे में काम करना उनके लिए वाकई कुछ कठिन था, वे वृद्ध हो चले थे. हांफते हुए वे जमीन पर फावड़ा चला रहे थे.
राजा महात्मा तक पहुंचा और बोला, “मैं आपसे तीन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहता हूँ. पहला: किसी भी कार्य को करने का सबसे अच्छा समय क्या है? दूसरा: किन व्यक्तियों के साथ कार्य करना सर्वोचित है? तीसरा: वह कौन सा कार्य है जो हर समय किया जाना चाहिए?
महात्मा ने राजा की बात ध्यान से सुनी और उसके कंधे को थपथपाया और खुदाई करते रहे. राजा ने कहा, “आप थक गए होंगे. लाइए, मैं आपका हाथ बंटा देता हूँ.” महात्मा ने धन्यवाद देकर राजा को फावड़ा दे दिया और एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए बैठ गए.
दो क्यारियाँ खोदने के बाद राजा महात्मा की ओर मुड़ा और उसने फिर से वे तीनों प्रश्न दोहराए. महात्मा ने राजा के प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया और उठते हुए कहा, “अब तुम थोड़ी देर आराम करो और मैं बगीचे में काम करूंगा.” लेकिन राजा ने खुदाई करना जारी रखा. एक घंटा बीत गया, फिर दो घंटे. शाम हो गयी. राजा ने फावड़ा रख दिया और महात्मा से कहा, “मैं यहाँ आपसे तीन प्रश्नों के उत्तर पूछने आया था पर आपने मुझे कुछ नहीं बताया. कृपया मेरी सहायता करें ताकि मैं समय से अपने घर जा सकूं.”
महात्मा ने राजा से कहा, “क्या तुम्हें किसी के दौड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही है?”. राजा ने आवाज़ की दिशा में सर घुमाया. दोनों ने पेड़ों के झुरमुट से एक आदमी को उनकी ओर भागते आते देखा. वह अपने पेट में लगे घाव को अपने हाथ से दबाये हुए था. घाव से बहुत खून बह रहा था. वह दोनों के पास आकर धरती पर गिर गया और अचेत हो गया. राजा और महात्मा ने देखा कि उसके पेट में किसी शस्त्र से गहरा वार किया गया था.राजा ने फ़ौरन उसके घाव को साफ़ किया और अपने वस्त्र को फाड़कर उसके घाव पर बाँधा ताकि खून बहना बंद हो जाए. कपड़े का वह टुकड़ा जल्द ही खून से पूरी तरह तर हो गया तो राजा ने उसके ऊपर दूसरा कपडा बाँधा और ऐसा तब तक किया जब तक खून बहना रुक नहीं गया.
कुछ समय बाद घायल व्यक्ति को होश आया और उसने पानी माँगा. राजा कुटिया तक दौड़कर गया और उसके लिए पानी लाया. सूरज अस्त हो चुका था और वातावरण में ठंडक आने लगी. राजा और महात्मा ने घायल व्यक्ति को उठाया और कुटिया के अन्दर बिस्तर पर लिटा दिया. वह आँखें बंद करके चुपचाप लेटा रहा. राजा भी पहाड़ चढ़ने और बगीचे में काम करने के बाद थक चला था. वह कुटिया के द्वार पर बैठ गया और उसे नींद आ गयी. सुबह जब उसकी आँख खुली तब सूर्योदय हो चला था और पर्वत पर दिव्य आलोक फैला हुआ था.
एक पल को वह भूल ही गया कि वह कहाँ है और वहां क्यों आया था. उसने कुटिया के भीतर बिस्तर पर दृष्टि डाली. घायल व्यक्ति अपने चारों ओर विस्मय से देख रहा था. जब उसने राजा को देखा तो बहुत महीन स्वर में बुदबुदाते हुए कहा, “मुझे क्षमा कर दीजिये”.
“लेकिन तुमने क्या किया है और मुझसे क्षमा क्यों मांग रहे हो”, राजा ने उससे पूछा.
“आप मुझे नहीं जानते पर मैं आपको जानता हूँ. मैंने आपका वध करने की प्रतिज्ञा ली थी क्योंकि पिछले युद्ध में आपने मेरे राज्य पर हमला करके मेरे बंधु-बांधवों को मार डाला और मेरी संपत्ति हथिया ली. जब मुझे पता चला कि आप इस पर्वत पर महात्मा से मिलने के लिए अकेले आ रहे हैं तो मैंने आपकी हत्या करने की योजना बनाई. मैं छुपकर आपके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था पर आपके सेवक ने मुझे देख लिया. वह मुझे पहचान गया और उसने मुझपर प्रहार किया. मैं अपने बचाव के लिए भागता हुआ यहाँ आ गया और आपके सामने गिर पड़ा. मैं आपकी हत्या को उद्यत था पर आपने मेरे जीवन की रक्षा की. मैं बहुत शर्मिंदा हूँ. मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपके उपकार का मोल कैसे चुकाऊँगा. मैं जीवनपर्यंत आपकी सेवा करूंगा और मेरी संतानें भी सदैव आपके कुल की सेवा करेंगीं. कृपया मुझे क्षमा कर दें”.
राजा यह जानकर बहुत हर्षित हुआ कि प्रकार उसके शत्रु का रूपांतरण हो गया. उसने न केवल उसे क्षमा कर दिया बल्कि उसकी संपत्ति लौटाने का वचन भी दिया और उसकी चिकित्सा के लिए अपने सेवक के मार्फ़त अपने निजी चिकित्सक को बुलावा भेजा. सेवक को निर्देश देने के बाद राजा महात्मा के पास अपने प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पुनः आया. उसने देखा, महात्मा पिछले दिन खोदी गयी क्यारियों में बीज बो रहे थे.
महात्मा ने उठकर राजा से कहा, “आपके प्रश्नों के उत्तर तो पहले ही दिए जा चुके हैं.”
“वह कैसे?”, राजा ने चकित होकर कहा.
“कल यदि आप मेरी वृद्धावस्था का ध्यान करके बगीचे में कार्य करने में मेरी सहायता नहीं करते तो आप वापसी में घात लगाकर बैठे हुए शत्रु का शिकार बन जाते. तब आपको यह खेद होता कि आपको मेरे समीप अधिक समय व्यतीत करना चाहिए था. अतः आपका कल बगीचे में कार्य करने का समय ही सबसे उपयुक्त था. आप जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिले वह मैं ही था. और आपका सबसे आवश्यक कार्य था मेरी सहायता करना. बाद में जब घायल व्यक्ति यहाँ चला आया तब सबसे महत्वपूर्ण समय वह था जब आपने उसके घाव को भलीप्रकार बांधा. यदि आप ऐसा नहीं करते तो रक्तस्त्राव के कारण उसकी मृत्यु हो जाती. तब आपके और उसके मध्य मेल-मिलाप नहीं हो पाता. अतः उस क्षण वह व्यक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण था और उसकी सेवा-सुश्रुषा करना सबसे आवश्यक कार्य था.”
“स्मरण रहे, केवल एक ही समय सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और वह समय यही है, इस क्षण में है. इसी क्षण की सत्ता है, इसी का प्रभुत्व है. सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति वही है जो आपके समीप है, आपके समक्ष है, क्योंकि हम नहीं जानते कि अगले क्षण हम किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने के लिए जीवित रहेंगे भी या नहीं. और सबसे आवश्यक कार्य यह है कि आपके समीप आपके समक्ष उपस्थित व्यक्ति के जीवन को सुख-शांतिपूर्ण करने के प्रयास किये जाएँ क्योंकि यही मानवजीवन का उद्देश्य है.”
कितना अच्छा होता यदि तॉल्स्तॉय की यह कथा हमारे सभी धर्मग्रंथों में होती. इसमें अपार पवित्रता है. इसमें जनसेवा और पुरुषार्थ का सन्देश है. यह बताती है कि सभी प्राणियों का हितचिंतन ही मानव जीवन का उद्देश्य है. यह किसी देवता की उपासना या पद्धति के अनुपालन की बात नहीं करती. हम सर्वत्र शांति की बातें करते नहीं थकते पर यह भूल जाते हैं कि हम इस ध्येय की प्राप्ति तभी कर सकते हैं जब हमारे सबसे निकट उपस्थित मनुष्यों के जीवन में प्रसन्नता का समावेश हो. यदि हम अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों, और परिजनों का जीवन ही नहीं संवारेंगे तो समाज का हित कैसे साध सकते हैं? यदि हमारी संतान ही बिलख रहीं हो तो दूसरों के आंसू पोंछने में कैसा गौरव? – तिक न्यात हन्ह
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मंगलवार, 23 अगस्त 2011
मंगलवार, 26 जुलाई 2011
चार बिल्लियां
कभी किसी जमाने में शोकेन नामक एक योद्धा रहता था. उसके घर में एक बहुत बड़ा और विशाल शैतान चूहा था. यह चूहा बड़ा ही ढीठ और उत्पाती था. शोकेन ने उसे मारने के बहुत प्रयत्न किये पर सफल नहीं हुआ. तंग आकर शोकेन एक व्यक्ति के पास गया जो चूहों को मारने के लिए बिल्लियों को प्रशिक्षण देता था. शोकेन ने उससे चूहे को मारने के लिए एक बिल्ली माँगी.
बिल्लीवाले ने शोकेन को अदरक जैसे रंगवाली बड़ी चपल बिल्ली दी जिसके दांत और नाखून बेहद नुकीले थे. उस बिल्ली ने जब चूहे का सामना किया तो चूहा उसे देखकर निर्भय खड़ा रहा और उल्टे बिल्ली भयभीत हो गयी. शोकेन बिल्ली को वापस बिल्लीवाले के पास ले गया.
"चूहा वाकई बड़ा बदमाश है", बिल्लीवाले ने कहा और शोकेन को एक दुबली चितकबरी बिल्ली दी. "इस बिल्ली को मैंने कई वर्ष सिखाया है और यह बहुत कुशल है".
दूसरी बिल्ली ने चूहे का डटकर सामना किया पर चूहे ने उसे भी आसानी से हरा दिया.
शोकेन वापस बिल्लीवाले के पास गया और इसबार एक खूंखार काली बिल्ली लेकर आया. यह बिल्ली दिखने में आत्मविश्वास से परिपूर्ण लगती थी. बिल्लीवाले ने कहा, "इस बिल्ली ने ध्यान के द्वारा अपने मन को एकाग्र करना सीखा है. इसकी तकनीक अचूक है. यह उस चूहे को ज़रूर मार भगायेगी." लेकिन वह बिल्ली भी चूहे से हार बैठी.
अबकी बार जब शोकेन बिल्लीवाले के पास गया तो बिल्लीवाले ने कहा, "कोई बात नहीं, इस बार मैं तुम्हें अपनी सभी बिल्लियों की बूढ़ी गुरु बिल्ली देता हूँ." यह बिल्ली बूढ़ी और बेढब थी. उसमें ज़रा भी आकर्षण नहीं था. शोकेन उस बिल्ली को चूहे के पास ले गया. चूहा बिल्ली के पास आया पर बिल्ली ने उसकी ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया. अचानक ही चूहा उसे देखकर भय से जड़वत हो गया. बूढ़ी बिल्ली ने इत्मीनान से अपना पंजा उठाया और एक वार में ही चूहे को ढ़ेर कर दिया.
शोकेन बिल्ली को बिल्लीवाले के पास लेकर गया और उससे पूछा, "इस बिल्ली ने चूहे को इतनी आसानी से कैसे मार दिया जबकि अन्य बिल्लियाँ युवा और मजबूत होते हुए भी हार गयीं?"
बिल्लीवाले ने कहा, "आप मेरे साथ आइये, मुझे यकीन है कि बिल्लियाँ इस बारे में बात ज़रूर करेंगी, और चूंकि वे मार्शल आर्ट के बारे में गहराई से जानती हैं इसलिए यह बात उनसे सुनना बहुत रोचक होगा". वे छुपकर बिल्लियों की बातचीत सुनने लगे.
पहली बिल्ली ने कहा, "मैं बहुत कठोर हूँ".
"तो फिर तुम चूहे को क्यों नहीं हरा पाईं?", बूढ़ी बिल्ली ने कहा, "क्योंकि कठोर होना ही पर्याप्त नहीं है. किसी कठोर बिल्ली को उससे कठोर चूहा कभी भी मिल सकता है."
चितकबरी बिल्ली ने कहा, "मैंने कई साल चूहे मारने के अचूक तरीके सीखे, फिर भी मैं उस चूहे से क्यों हार गयी?". बूढ़ी बिल्ली ने जवाब दिया, "ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तुम सालों तक कुछ-एक ही दांव आजमाती रहीं और उस मुकाबले में वे दांव काम नहीं आये".
"लेकिन मैंने तो ध्यान साधना के द्वारा अपने मन और शरीर को परिपूर्ण कर लिया था", काली बिल्ली ने कहा, "मेरा कौशल अपरिमित होने और मुझे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद भी मैं उस चूहे से कैसे हार गयी?"
"तुम्हारा कौशल निस्संदेह परिपूर्ण है और तुमने शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियां अर्जित कर ली हैं तिसपर भी तुम विषयों एवं कामनाओं से रिक्त नहीं हो. जब तुमने उस चूहे का सामना किया तब तुम्हारे मन में उसका वध करने की इच्छा प्रबल हो उठी. तुम अपनी इच्छा का अधिक्रमण नहीं कर सकीं और चूहे ने इसे भांप लिया. इस बात में वह तुमसे अधिक परिपक्व था. चूंकि तुम अपने मन को निर्विकार नहीं कर सकीं इसलिए तुम्हारी शक्तियों, तकनीकों, और चेतना का एकीकरण नहीं हुआ. चूहे को मारते समय मैंने इन तीनों तत्वों को साध लिया इसलिए मैं उसे निष्प्रयास ही मार सकी. यही मेरी सफलता का कारण है."
"लेकिन मैं एक और बिल्ली को जानती हूँ जो यहाँ से कुछ दूर एक गाँव में रहती है. पकी उम्र की होने के कारण उसके बाल सन जैसे सफ़ेद हो गए हैं. वह देखने में बिलकुल कठोर नहीं लगती. वह मांस नहीं खाती बल्कि चावल सब्जी से अपना पेट भरती है. उसने कई सालों से एक भी चूहा नहीं मारा है क्योंकि चूहे उससे अत्यंत भयभीत रहते हैं और जैसे ही वह किसी घर में दाखिल होती है तो वहां के सारे चूहे फ़ौरन घर छोड़ देते हैं. वह बिल्ली अपनी नींद में भी चूहों को अचेत कर देती है. हम सभी को उस बिल्ली जैसा ही होना चाहिए - वह हिंसा व अहिंसा के परे है. उसकी कोई तकनीक नहीं है, उसके मन में चूहों को मारने की इच्छा तक नहीं है."
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बिल्लीवाले ने शोकेन को अदरक जैसे रंगवाली बड़ी चपल बिल्ली दी जिसके दांत और नाखून बेहद नुकीले थे. उस बिल्ली ने जब चूहे का सामना किया तो चूहा उसे देखकर निर्भय खड़ा रहा और उल्टे बिल्ली भयभीत हो गयी. शोकेन बिल्ली को वापस बिल्लीवाले के पास ले गया.
"चूहा वाकई बड़ा बदमाश है", बिल्लीवाले ने कहा और शोकेन को एक दुबली चितकबरी बिल्ली दी. "इस बिल्ली को मैंने कई वर्ष सिखाया है और यह बहुत कुशल है".
दूसरी बिल्ली ने चूहे का डटकर सामना किया पर चूहे ने उसे भी आसानी से हरा दिया.
शोकेन वापस बिल्लीवाले के पास गया और इसबार एक खूंखार काली बिल्ली लेकर आया. यह बिल्ली दिखने में आत्मविश्वास से परिपूर्ण लगती थी. बिल्लीवाले ने कहा, "इस बिल्ली ने ध्यान के द्वारा अपने मन को एकाग्र करना सीखा है. इसकी तकनीक अचूक है. यह उस चूहे को ज़रूर मार भगायेगी." लेकिन वह बिल्ली भी चूहे से हार बैठी.
अबकी बार जब शोकेन बिल्लीवाले के पास गया तो बिल्लीवाले ने कहा, "कोई बात नहीं, इस बार मैं तुम्हें अपनी सभी बिल्लियों की बूढ़ी गुरु बिल्ली देता हूँ." यह बिल्ली बूढ़ी और बेढब थी. उसमें ज़रा भी आकर्षण नहीं था. शोकेन उस बिल्ली को चूहे के पास ले गया. चूहा बिल्ली के पास आया पर बिल्ली ने उसकी ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया. अचानक ही चूहा उसे देखकर भय से जड़वत हो गया. बूढ़ी बिल्ली ने इत्मीनान से अपना पंजा उठाया और एक वार में ही चूहे को ढ़ेर कर दिया.
शोकेन बिल्ली को बिल्लीवाले के पास लेकर गया और उससे पूछा, "इस बिल्ली ने चूहे को इतनी आसानी से कैसे मार दिया जबकि अन्य बिल्लियाँ युवा और मजबूत होते हुए भी हार गयीं?"
बिल्लीवाले ने कहा, "आप मेरे साथ आइये, मुझे यकीन है कि बिल्लियाँ इस बारे में बात ज़रूर करेंगी, और चूंकि वे मार्शल आर्ट के बारे में गहराई से जानती हैं इसलिए यह बात उनसे सुनना बहुत रोचक होगा". वे छुपकर बिल्लियों की बातचीत सुनने लगे.
पहली बिल्ली ने कहा, "मैं बहुत कठोर हूँ".
"तो फिर तुम चूहे को क्यों नहीं हरा पाईं?", बूढ़ी बिल्ली ने कहा, "क्योंकि कठोर होना ही पर्याप्त नहीं है. किसी कठोर बिल्ली को उससे कठोर चूहा कभी भी मिल सकता है."
चितकबरी बिल्ली ने कहा, "मैंने कई साल चूहे मारने के अचूक तरीके सीखे, फिर भी मैं उस चूहे से क्यों हार गयी?". बूढ़ी बिल्ली ने जवाब दिया, "ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तुम सालों तक कुछ-एक ही दांव आजमाती रहीं और उस मुकाबले में वे दांव काम नहीं आये".
"लेकिन मैंने तो ध्यान साधना के द्वारा अपने मन और शरीर को परिपूर्ण कर लिया था", काली बिल्ली ने कहा, "मेरा कौशल अपरिमित होने और मुझे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो जाने के बाद भी मैं उस चूहे से कैसे हार गयी?"
"तुम्हारा कौशल निस्संदेह परिपूर्ण है और तुमने शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियां अर्जित कर ली हैं तिसपर भी तुम विषयों एवं कामनाओं से रिक्त नहीं हो. जब तुमने उस चूहे का सामना किया तब तुम्हारे मन में उसका वध करने की इच्छा प्रबल हो उठी. तुम अपनी इच्छा का अधिक्रमण नहीं कर सकीं और चूहे ने इसे भांप लिया. इस बात में वह तुमसे अधिक परिपक्व था. चूंकि तुम अपने मन को निर्विकार नहीं कर सकीं इसलिए तुम्हारी शक्तियों, तकनीकों, और चेतना का एकीकरण नहीं हुआ. चूहे को मारते समय मैंने इन तीनों तत्वों को साध लिया इसलिए मैं उसे निष्प्रयास ही मार सकी. यही मेरी सफलता का कारण है."
"लेकिन मैं एक और बिल्ली को जानती हूँ जो यहाँ से कुछ दूर एक गाँव में रहती है. पकी उम्र की होने के कारण उसके बाल सन जैसे सफ़ेद हो गए हैं. वह देखने में बिलकुल कठोर नहीं लगती. वह मांस नहीं खाती बल्कि चावल सब्जी से अपना पेट भरती है. उसने कई सालों से एक भी चूहा नहीं मारा है क्योंकि चूहे उससे अत्यंत भयभीत रहते हैं और जैसे ही वह किसी घर में दाखिल होती है तो वहां के सारे चूहे फ़ौरन घर छोड़ देते हैं. वह बिल्ली अपनी नींद में भी चूहों को अचेत कर देती है. हम सभी को उस बिल्ली जैसा ही होना चाहिए - वह हिंसा व अहिंसा के परे है. उसकी कोई तकनीक नहीं है, उसके मन में चूहों को मारने की इच्छा तक नहीं है."
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