गुरुवार, 12 जनवरी 2012

अब मधुमेह का इलाज जल्द हो सकेगा

मधुमेह पीड़ित लोगों के लिए एक अच्छी खबर है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि जल्द ही वे इसका इलाज ढूंढ निकालने वाले हैं।


वैज्ञानिकों के अनुसार पैन्क्रियाज अर्थात अग्नायशय को नियंत्रित कर इंसुलिन की जरूरत नहीं पड़ेगी। इलिनोइस विश्वविद्यालय के दल ने स्टेम कोशिकाओं की मदद से मधुमेह पीड़ित व्यक्ति के टी सेल को मधुमेह के प्रति रक्षक बनाने की तैयारी की है। ‘बी एम सी’ मेडिकल जर्नल के अनुसार, इस विधि से 38 प्रतिशत तक इंसुलिन की जरूरत को कम किया जा सकेगा।


व्यक्ति टाइप 1 मधुमेह से तब पीड़ित होता है जब प्रतिरोधक प्रणाली इंसुलिन पैदा करने वाली बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देती है और ग्लुकोज के स्तर अनियंत्रित हो जाता है। इस दल का नेतृत्व करने वाले डॉ योंग झाओ ने कहा कि यह मधुमेह के इलाज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
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सेक्स है कत्ल की बड़ी वजह

कुछ साल पहले एक जाने-माने पत्रकार का लेख पढ़ा। लेख का लब्बोलुआब यह था कि देश में जितने भी आपराधिक वारदात होते हैं, ज्यादातर मामलों में उसकी वजह लड़की या फिर महिलाएं होती है। लेख का आशय यह था कि आपराध के अलग-अलग आयामों में ज्यादातर केस में केंद्र बिंदु महिलाएं होती है। बुजुर्गों से बचपन में यह भी सुनता आया हूं कि महाभारत भी औरतों की खातिर हुआ और रामायण के केंद्र बिंदु में भी महिला यानी सीता रही। अभी हाल ही में दिल्ली पुलिस ने अपराध पर आंकड़े जारी किए। आंकड़ों की इस रिपोर्ट में दावे किए गए कि लूट, छीना-झपटी और वाहन चोरी की घटनाओं में कमी आई है और दिल्ली पुलिस इसपर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह से कामयाब रही है। लेकिन दिल्ली पुलिस की इस रिपोर्ट में महिलाओं से जुड़े अपराध की बात आई तो उसकी बोलती बंद हो गई। वर्ष 2011 में दिल्ली में कुल 543 हत्याएं हुई जिनमें 18 फीसदी अवैध संबंधों की वजह से हुई।

जाहिर सी बात है कि इन हत्याओं के पीछे वजह सेक्स था, भले ही वह अवैध संबंध क्यों ना हो। 17 फीसदी हत्याएं गुस्से में आकर की गई। अवैध संबंधों में हत्याओं की वजह में कहीं किसी महिला ने अपने पति की हत्या करवा दी, तो कहीं पत्नी के चरित्र पर शक की वजह से पति ने अपनी ही पत्नी को मरवा डाला। इन सबमें चिंता की बात यह है कि महिलाओं के लिए दिल्ली दिन-ब-दिन असुरक्षित होती चली जा रही है।

दिल्ली सरकार और उसके आला पुलिस अधिकारी महिलाओं के महफूज होने के तमाम दावे कर लें लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि महिलाएं दिल्ली में कतई महफूज नहीं है। दिल्ली पुलिस के इन ताजा आंकड़ों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि महिलाओं के लिए राजधानी और डरावनी हो गई है। यहां छेड़खानी और बलात्कार के मामलों में ताबड़तोड़ इजाफा हो रहा है। जारी किए गए इन आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में वर्ष 2011 में 568 बलात्कार की वारदात दर्ज की गई। बलात्कार के आंकड़ों पर गौर डालें तो साबित होता है कि दिल्ली में रोजाना औसतन दो रेप के मामले होते हैं। जबकि वर्ष 2010 में रेप के 507 मामले दर्ज किए गए थे। छेड़छाड़ के मामले में भी इस वर्ष खासा इजाफा हुआ जो चिंता की बात है। वर्ष 2010 में यह संख्या जहां 601 थी वहीं 2011 में यह बढ़कर 653 तक जा पहुंची।

दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2010 के मुकाबले 2011 में बलात्कार की घटनाओं में 13 फीसदी का इजाफा हुआ है। छेड़खानी की घटनाओं में भी बीते वर्ष 11 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। महिलाओं को फोन कर अश्लील बातें या मैसज करने की वारदातों में तो दोगुना इजाफा हुआ है। दिल्ली में महिलाओं से जुड़े आपराधिक मामलों में वृद्धि हुई है लेकिन सच यह भी है कि ज्यादातर मामलों में इस प्रकार के अपराध को अंजाम देनेवाले अपराधी उनके जान-पहचान के या फिर पड़ोसी होते हैं। आंकड़े कहते हैं कि बलात्कार के मामले में केवल 2.5 फीसदी आरोपी ही पीड़ित से अनजान थे।

रायटर द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक महिलाओं के लिए पांच असुरक्षित देशों में भारत भी शुमार होता है। भारत के अलावा आफगानिस्तान, कांगो, पाकिस्तान और सोमालिया में भी महिलाओं को हत्या, बलात्कार, घरेलू हिंसा, ऑनर किलिंग जैसे वारदातों से जूझना पड़ता है। विश्व बैंक के एक सर्वे के मुताबिक 15 से 44 फीसदी वर्ष की आयु वर्ग वाली महिलाओं को कैंसर, कार दुर्घटना, युद्ध और मलेरिया से अधिक खतरा बलात्कार और घरेलू हिंसा के शिकार बनने का होता है। हिंसा और अपराध समाज के दो ऐसे पहलू है जो असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। हिंदू धर्मग्रंथ महाभारत में यह बात सामने आती है कि जिस कुल में महिलाओं का आदर नहीं होता है उस कुल का नाश हो जाता है। अपराध पर अंकुश हर हाल में जरूरी है। मैं दक्षिण भारत के कई शहरों में घूमा हूं। वहां महिलाएं बेखौफ घूमती हैं। दिल्ली की तुलना में महिलाओं में सुरक्षा की भावना वहां ज्यादा हैं।

यह सही है कि पुलिस हर व्यक्ति को अलग-अलग सुरक्षा मुहैया करा सकती है। लेकिन समाज में रहने वाली महिलाओं और लड़कियां बेखौफ होकर कहीं भी आ-जा सकें, यह भावना पैदा करना जरूरी है और यह नामुमकिन भी नहीं है। आंकड़ों में उलझने से बेहतर है इस दिशा में थोड़ी गंभीर पहल की जाए। समय रहते यह सोचने की जरूरत है कि आखिर कैसे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध पर काबू पाया जाए।
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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

माँ सब जानती है

'' मैं कभी बतलाता नहीं , पर अँधेरे से डरता हूँ मैं माँ ,
यूँ तो मैं दिखलाता नहीं , तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ ,
तुझे सब है पता है न माँ , तुझे सब है पता मेरी माँ |''

बहुचर्चित फिल्म 'तारे ज़मीन पर ' का ये गीत हर बच्चे के जीवन का एक एसा सार्वभौमिक सत्य है जिसे नकारा नहीं जा सकता | सच है! ' माँ को सब पता होता है' |

जन्म के तुरंत बाद नए नए हांथो का वो पहला स्पर्श जो याद तो शयद किसी को नहीं पर महसूस सब कर सकते हैं | जोर जोर से धड़कता हुआ एक दिल जब इस दुनियां में आता है और उन हांथो में सौपा जाता है जिसकी वजह से वो है , उस वक्त उस दिल की धड़कने अपने आप ही सामान्य हो जाती हैं , मानो एक जड़ से उखाड़े पौधे को फिर से ज़मीन मिल गयी हो | शांत भाव से वो नयी चमकदार ऑंखें उस चेहरे को को देखने और समझने का प्रयास करतीं हैं , जिसे अब तक उसने सिर्फ महसूस किया था | एक अजीब सा एहसास है शायद ! आश्चर्य से भरी वो ऑंखें यही सोचतीं हैं की ये कौन हैं ? कौन है ये, जो नया तो है पर ना जाने क्यूँ जाना पहचाना सा लगता है , ऐसा क्यूँ लगता है की ये तो वही है जो मेरे होने का प्रमाण है , मेरे अस्तित्व की वजह है | क्या अगर ये चेहरा नहीं होता तो मैं भी नहीं होता? न जाने कितने ऐसे सवाल उस नए ह्रदय और मस्तिष्क में चल रहे होते हैं | लेकिन वो अबोध समय दर समय इन सवालों के जवाब खुद ही खोज लेता है |
वक्त बीतता चला जाता है और समय साथ साथ ये रिश्ता और भी मज़बूत होता चला जाता है | याद है स्कूल का वो पहला दिन जब मन इस डर से भरा रहता है की अब माँ को छोड़कर जाना है |
माँ के हांथों को मज़बूती से पकडे वो कोमल हाँथ जैसे अपनी सारी ताकत लगा देतें हैं खुद को उस शरीर से जोड़े रखने के लिए |रात के आंचल में माँ का वो कुछ गुनगुनाकर सुलाना और हमारा ये जिद करना कि 'माँ कोई कहानी सुनाओ ना ' | वो सब कितना पाक़ था कितना खूबसूरत था | उस वक्त वो कहानियाँ कितनी सच्ची लगतीं थीं | मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के शब्द सही ही कह रहे हैं कि
' मुझको यकीं है सच कहती थी , जो भी अम्मी कहती थी ,
जब मेरे बचपन के दिन दिन थे चाँद में परियां रहतीं थी |'


वक्त बीतता जाता है और हम बड़े होते जाते हैं | घर से स्कूल , स्कूल से कॉलेज वक्त तो मानो पंख लगा कर भागता है | लेकिन हर बार मन में एक सुकून का एहसास होता है कि हमारी माँ हमारे साथ है | मेरी तरफ आने वाली हर मुसीबत , हर तकलीफ को पहले मेरी माँ के मज़बूत सीने से होकर गुज़ारना पड़ेगा | हम हमेशा सुरक्षित हैं क्यूंकि हमारी माँ है |

' घोंसले में आई चिड़िया से चूजों ने पूंछा ,
माँ आकाश कितना बड़ा है ?
चूजों को पंखों के निचे समेटती बोली चिड़िया ,
सो जाओ , इन पंखों से छोटा है |

सारी माएं ऐसी ही तो होतीं हैं | हर बार रह दिखाती हुयी , हर बार समझाती हुई और हर हमारी गलतियों पर पर्दा डालती हुई |
मशहूर शायर 'मुनव्वर राणा' के अल्फाजों में ----
' जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है |'

दूर होने पर भी एक एहसास हम दोनों को जोड़े रखता है | खास तौर पर उस वक्त जब लगता है कि कोई भी अब साथ नहीं है , हम पूरी तरह से मुसीबत में घिर चुके हैं | तब एक माँ ही तो है जो साथ ना होकर भी हमेशा साथ रहती है | निदा फ़ाज़ली के शब्दों में ---' मैं रोया परदेस में , भीगा माँ का प्यार ,दुःख ने दुःख से बात कि बिन चिठ्ठी बिन तार |'

घनघोर रात के साये में जब हम अकेले बैठे सोच रहे होतें हैं, रो रहे होतें हैं , खुद से सवाल कर रहे होते हैं और माँ को याद कर रहे होते हैं, तभी अचानक फोन कि घंटी बजती है और उस पार से आवाज़ आती है ---------" बेटा कैसे हो , ठीक तो हो ना , कोई तकलीफ तो नहीं है | तबियत तो ठीक है ना , आज जी बहुत घबरा रहा था , एसा लग रहा था कि मानो मेरे कलेजे का टुकड़ा किसी मुसीबत मे है, बोल बेटा तो ठीक तो है ना " ?
जवाब मिलता है ---" मै ठीक हूँ माँ, अब वाकई में ठीक हूँ , तुम मेरे साथ हो ना , तो सब अपने आप ही ठीक हो जायेगा , तुम बिलकुल चिंता मत करो सब ठीक है" |भरे गले से कहा ---" माँ आवाज़ साफ़ नहीं आ रही है बाद में फ़ोन करते है |"
फ़ोन का रिसीवर रखकर अपने आंसू पोंछते हैं और खुद से ये सवाल करते हैं कि माँ के गर्भ से बहार आये हुए तो कई बरस हो गए लेकिन सच तो ये है कि आज भी हम पूरी तरह से अलग नहीं हो पाए हैं |


मुसीबत के ऐसे पलों में माँ के वो चन्द शब्द ऐसा एहसास दिला देते हैं कि लगता है कि एक ही पल में सब कुछ ठीक हो जायेगा | हमारी सारी मुसीबतें अपने आप ही भाग जाएँगी | ऐसा लगता है कि जैसे माँ का ममता और आशीर्वाद भरा हाँथ सिर पर रख दिया और सारी परेशनियाँ छूमंतर |

' माँ ' एक ऐसा रिश्ता जो हर रिश्ते से कम से कम नौ माह पुराना होता है | एक रिश्ता जो पहली धड़कन से शुरू होकर आखिरी साँस तक चलता है | एक ऐसा रिश्ता जो हर वक्त हमारे स्थ होता है चाहे हम जहाँ भी रहें | एक ऐसा रिश्ता जो न जाने कैसे जान जाता है कि आज हम मुसीबत में हैं |




' मेरी तकलीफ को मुझसे पहले कैसे पहचान लेतीं है वो,
कुछ उलझन है मुझे ये कैसे मान लेतीं है वो ,खुद के ग़मों को तो होंठों तक आने देती नहीं हूँ मैं,क्या धड़कन से ही सब कुछ ही जान लेतीं हैं वो |"


सच कहूं तो आज तक समझ नहीं पाई कि कैसे कर लेतीं हैं वो ये सब ? शायद इसीलिए क्यूंकि अभी मैं सिर्फ एक बेटी हूँ माँ नहीं |

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http://krati-fourthpillar.blogspot.com/2011/03/blog-post.html se liya gatya hai

school days



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' माँ '

' मेरी तकलीफ को मुझसे पहले कैसे पहचान लेतीं है वो,कुछ उलझन है मुझे ये कैसे मान लेतीं है वो,खुद के ग़मों को तो होंठों तक आने देता नहीं हूँ मैं, क्या धड़कन से ही सब कुछ ही जान लेतीं हैं वो |"


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इतिहास एक याद [काकोरी कांड]


1924 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' चंद युवा क्रांतिकारियों द्वारा बनाया गया एक ऐसा संगठन जो

संगठित सशस्त्र क्रांति पर विश्वास रखता था | 9 अगस्त सन 1925 को इस संगठन ने उत्तर रेलवे के

लखनऊ सहारनपुर संभाग के काकोरी नाम के स्टेशन पर 8 डाउन ट्रेन पर डकैती डाल कर सरकारी खजाने

को लूटा |

यही घटना इतिहास में काकोरी कांड कहलाई| इस पूरे मामले में कुल 29 लोगों की गिरफ़्तारी हुई| जिनमे से

राम प्रसाद बिस्मिल , राजेंद्र लाहिड़ी , रोशन सिंह और अशफाकुल्ला खां को दिसंबर 1927 में फांसी हुई |

शचीन्द्रनाथ सान्याल को आजीवन कारावास की सजा हुई | मन्मथ नाथ गुप्ता को 14 साल की सजा हुई |

कई और क्रांतिकारियों को भी लंबी सजाए हुई |



इस कांड में चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे पर वो अंग्रेजों के

हाँथ नहीं आये | बाद में लाहौर केस में भी वो अपनी चतुराई से बच निकले , लेकिन 27 फरवरी सन 1931

को इलाहाबाद के एल्फ्रेड पार्क में पुलिस से हुई मुटभेड में वो शहीद हो गए | इतिहास में युवा क्रांतिकारियों

का ये अध्याय आज भी युवाओं की पहली पसंद है | आज भी ना जाने कितनी फिल्मों में इस क्रांति को बेहद

ही खूबसूरती से दिखाया जाता है |

हम भारतीय है और हमारा ये फ़र्ज़ है की आज हम सब उन शहीदों को एक श्रधांजलि दें , और याद करें उनके


बलिदान | और दुनिया को ये विश्वास दिला दें की क्रांतिकारी आज भी पैदा होते हैं |

राम प्रसाद बिस्मिल


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

--राम प्रसाद बिसमिल

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