गुरुवार, 1 सितंबर 2011

जयप्रकाश नारायण जी के पीछे का प्रकाश थीं प्रभावती जी

जयप्रकाश नारायण के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं, क्योंकि 1975 में इन्दिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल के विरोध में उनके द्वारा किया गया संघर्ष अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है। इससे पूर्व उन्होंने गांधी जी और बाद में विनोबा जी के साथ सर्वोदय आन्दोलन में भी काफी काम किया था; पर उनकी पत्नी प्रभावती जी का नाम प्राय: अल्पज्ञात ही है, जबकि जयप्रकाश जी को पीछे से सहारा देने में उनका योगदान भी कम नहीं है।

प्रभावती जी के पिता जी का नाम ब्रजकिशोर बाबू था। प्रभा जी उनकी जीवित चार सन्तानों में से सबसे बड़ीं थीं। उनका जन्म जानकी नवमी को हुआ था। मां फुलझड़ी देवी घरेलू महिला थीं; पर पिता जी राजनीति और स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय थे। प्रभा जी के ऊपर अपने पिता जी के विचारों का भरपूर प्रभाव पड़ा। प्रभा जी 12 साल की अवस्था तक लड़को जैसे कपड़े पहनतीं थीं। बाद में दादी जी के कहने पर उन्होंने साड़ी बाँधी।

प्रभा जी गहनों, कपड़ों आदि के बदले घरेलू कार्य, पेड़-पौधों की, देखभाल आदि में अधिक रुचि लेतीं थीं। ब्रजकिशोर जी स्त्री शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे। अत: उन्होंने प्रभा जी को हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत की उच्च शिक्षा दिलायी। 1920 में प्रभा जी का विवाह बिना तिलक और दहेज के सादगीपूर्ण रीति से जयप्रकाश जी के साथ हो गया। उस समय जयप्रकाश जी 18 और प्रभा जी 14 वर्ष की थीं। उनका गौना 5 साल बाद हुआ।

विवाह के बाद जयप्रकाश जी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गये, जबकि प्रभा जी गाँधी जी और कस्तूरबा के सान्निध्य में साबरमती आश्रम में आ गयीं। यहां रह कर उन पर स्वदेशी, स्वभूषा, स्वभाषा, आदि के संस्कार पड़े। उन्होंने बीमार कस्तूरबा की खूब सेवा की । बाद में इन्हीं से प्ररित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ ही अशिक्षा, बाल विवाह और पर्दा प्रथा का विरोध कर नारियों को जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

प्रभा जी की कोई सन्तान नहीं थी; क्योंकि पति-पत्नी दोनों ने परस्पर सहमति से समाज सेवा को जीवन में सर्वाधिक महत्व देते हुए कोई सन्तान उत्पन्न न करने का निर्णय लिया था; लेकिन वह समाज सेवी संस्थाओं को ही अपनी सन्तान की तरह प्यार करती थीं। उन्होंने अनेक बाल विद्यालयों की स्थापना की, जिनमें से कुछ कन्याओं के लिए भी थे। प्रभा जी दहेज व्यवस्था की विरोधी थीं। उनका अपना विवाह भी ऐसे ही हुआ था। अगे चलकर उन्होंने लगभग 600 विवाह बिना दहेज के सम्पन्न कराये।

प्रभा जी ने जयप्रकाश जी के साथ दुनिया के अनेक देशों का भ्रमण किया और वहाँ महिलाओं की उन्नत स्थिति देखी। इसका उनके मन पर बहुत प्रभाव पड़ा। वे कहतीं थीं कि नारी का जीवन प्रेम और सेवा की आधारशिला है। महिलाओं में इश्वरीय शक्ति विद्यमान है। वे प्रेम से परिवार, समाज और राष्ट्र की अनीति को नीति में बदल सकती हैं। समाज में स्त्रियों की भागीदारी जितनी बढ़ेगी, उतना ही पुराना पाखण्ड टूटेगा।

प्रभा जी को कैंसर का रोग था; परन्तु उन्होंने अपना दु:ख कभी दूसरों के सामने व्यक्त नहीं किया। वे सदा प्रसन्न रहतीं थीं। जब तक सम्भव हुआ, उन्होंने अपने पति जयप्रकाश जी का ध्यान रखा। 15 अपैल, 1973 को उनका देहान्त हो गया।


(साभार- पुस्तकः हर दिन पावन, लेखकः विजय कुमार, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ)

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