गुरुवार, 1 सितंबर 2011

आओ जानें संजीवनी विद्या

प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक उमाकांत केशव आपटे उपाख्य बाबासाहेब आपटे की विचारशीलता अद्भूत थी। उनका जन्म 28 अगस्त, सन् 1903 में हुआ था। सन् 1920 में वे संघ के संपर्क में आए और सन् 1931 में संघ के प्रथम प्रचारक बने। उनके अंदर पढने और उसे ह्दयंगम् कर उसका कुशल विवेचन करने की अनूठी ईश्वर प्रदत्त विशेषता थी जिसका उपयोग कर न केवल उन्होंने रा.स्व.संघ के कार्य को गति प्रदान की वरन् भारतीय जीवन-परंपरा के प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने गजब का समाज-प्रबोधन किया। 26 जुलाई, सन् 1972 को उनका निधन हो गया। रा. स्व.संघ के पूर्व सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह के अनुसार, भौतिक जीवन के 70 वर्ष वह पूर्ण नहीं कर पाए लेकिन कार्य इतना कर गए कि कोई 100 वर्ष में भी न कर सके।
ऐसी महान प्रतिभा की स्मृति में हम अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनके प्रबोधनकारी विचारों को वेबपोर्टल के माध्यम से पुनर्प्रकाशित कर आधुनिक पीढ़ी को उनसे परिचित कराने में हमें अपार प्रसन्नता हो रही है। ये विचार कालजयी हैं, हमें न सिर्फ हमारे गौरवमयी अतीत से परिचित कराते हैं वरन् ये हमारा भविष्यपथ भी निर्धारित कर सकने में सक्षम हैं। प्रस्तुत है उनकी विचार श्रंखला पर आधारित आलेख-माला की पहली कड़ी-संपादक


पौराणिक ग्रंथों में संजीवनी विद्या का उल्लेख बार-बार किया गया है। राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य को यह विद्या प्राप्त थी। देवों एवं राक्षसों के युद्ध में जब-जब राक्षस मारे जाते, तब-तब उनके ये गुरु अपनी संजीवनी विद्या के सामर्थ्य से उन्हें फिर जीवित कर देते थे। यह संजीवनी विद्या देवपक्ष में किसी को भी ज्ञात नहीं थी। अतः उसे हस्तगत करने के लिये देवगुरु बृहस्पति का पुत्रा कवच शुक्राचार्य के पास किस प्रकार गया और वहां रहकर भी शुक्रकन्या देवयानी के प्रेमपाश में न फंसते हुए उसने अपना हेतु किस प्रकार सिद्ध किया, यह वृत्तांत महाभारत में अत्यन्त सुन्दर एवं विस्तृत ढंग से वर्णित है। इस कथा से अपने देश के वृद्ध इतने अधिक परिचित हैं कि आज भी जब कोई युवक यूरोप-अमेरिका में विद्यार्जन के लिए जाता है तो वह किस प्रकार से मोहजाल में न फंसकर अपना स्वाभिमान और संस्कृति कायम रखकर स्वदेश वापस आ जाय; इस दृष्टि से उसे इस प्राचीन काल के कच की उपमा देकर, उसका गौरव करके, उसे उसके कर्तव्य का बोध कराया जाता है।

परंतु जिस विद्या को संपादित करने के लिए कच को इतनी लोकोत्तर कीर्ति प्राप्त हुई, उस संजीवनी विद्या के समग्र विस्तृत वर्णन की तो बात ही क्या, उसके अंशमात्र का किंचित वर्णन भी पुराणों में या अन्य किसी ग्रंथ में उपलब्ध नहीं है। एक शुक्राचार्य के अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा इस विद्या का प्रयोग किये जाने का उल्लेख तक भी नहीं मिलता। तो क्या अन्य अनेक विद्याओं के समान ही यह संजीवनी विद्या भी सदासर्वदा के लिए विनष्ट हो गई?

संजीवनी का स्वरूप
इस संजीवनी विद्या के स्वरूप के संबंध में इन दिनों कई विचित्र कल्पनाएं प्रकट की गई हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह जड़ी-बूटी जैसी ही कोई वस्तु होगी। कई लोग कहते हैं कि यह एक मंत्र है। यह स्पष्ट है कि उनका यह मत महाभारत के वर्णन पर आधारित है। कई लोगों ने यह भी तर्क प्रस्तुत किया है कि संजीवनी एक विशिष्ट राज्यपद्धति का नाम था एवं राक्षसों के बीच शुक्राचार्य ने यह पद्धति प्रारंभ की थी और उसमें भी वर्तमान लोकसत्तात्मक राज्यपद्धति के अनुसार ही व्यवस्था थी। तो कुछ लोगों का तर्क है कि औषधि, मंत्र एवं विद्युत प्रयोग के सम्मिश्रण से बनी एक प्रक्रिया ही संजीवनी है।
परंतु संजीवनी कोई जड़-मूल या किसी पेड़-पत्ती की औषधि होगी, यह असंभव ही लगता है, क्योंकि प्रथम बार तो कच के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर के लकड़बग्घों को खिला दिए गए थे। दूसरी बार उसकी मृत देह जलाकर उसकी राख समुद्र में फेंक दी गई थी और तीसरी बार तो उस राख को मद्य में मिलाकर उसे स्वयं शुक्राचार्य को ही प्राशन करने को दे दिया गया था। अब संजीवनी को यदि एक मंत्र माने तो शुक्राचार्य ने वह मंत्र कच को जब दिया, उस समय उसकी परंपरा भी बताई गई हो, ऐसा उल्लेख कहीं भी दिखाई नहीं देता। ऐसा क्यों? फिर यह प्रभावशाली मंत्र नष्ट न हो, ऐसी कोई व्यवस्था आचार्यों ने क्यों नहीं की? तीसरा तर्क यह है कि संजीवनी राज्यपद्धति का ही एक प्रकार था। परंतु कच की कहानी के संदर्भ से यह तर्क मेल नहीं खाता और औषधि, मंत्र एवं विद्युत प्रयोग के सम्मिश्रण की प्रक्रिया अर्थात् संजीवनी, यह तो कल्पना की मात्र एक उड़ान सी लगती है। इस प्रकार जितना अधिक विचार करते जायें उतना ही संजीवनी विद्या के स्वरूप् का रहस्य गहरा होता जाता है और फिर इस विषय पर चुप्पी साध लेनी पड़ती है।
पुराण, रामायण, महाभारत आदि धर्मग्रंथों का एक-एक अक्षर सत्य है- यह लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही दृष्टियों से सत्य है, ऐसा मानने वालों की संख्या भारतवर्ष में आज भी बहुत बड़ी है। फिर भी जिनके मन में अब तक इस प्रकार की श्रद्धा स्थिर नहीं हुई है तथा कार्य-कारणभाव एवं योग्यायोग्यता के विचार के आधार पर ही प्रत्येक बात की सत्यासत्यता निर्णीत करने की जिनकी इच्छा रहती है, ऐसे लोगों का भी तो समाधान होना ही चाहिए।

जीवन और मृत्यु
संजीवनी विद्या का स्वरूप ठीक से ध्यान में आने के लिए प्रथम एक बात अच्छी तरह से समझ लेना आवश्यक है कि जीवन या मृत्यु के संबंध में तत्कालीन लोगों की धारणा क्या थी? 'मात्र अग्नक्षय करते हुए पालित-पोषित शरीर अर्थात् जीवन या जीवितावस्था', एवं 'शरीर नष्ट होने पर वह मृत्यु है'' यह कल्पना उन दिनों प्रचलित नहीं थी। उन दिनों पूज्य व्यक्तियों का अपमान करना उन व्यक्तियों के वध के समान ही माना जाता था। सज्जन पुरुष यदि स्वयं ही अपनी स्तुति करें तो वह आत्मवध कहलाता था। ये कल्पनाएं अपने धर्मग्रंथों में कई स्थानों पर मिलती है। अमरकोश में वध करना या मार डालना इसके पर्यायवाचक जो अनेक शब्द दिये गये हैं, उनमें से तीन शब्दों का विचार यहां आवश्यक है। ये शब्द- प्रवासन, निर्वासन तथा परिवर्जन। दीर्घकाल तक स्वकीयों से दूर रहना अर्थात् प्रवासन, सीमापर किया जाना यानि निर्वासन एवं जो कार्य करने की अपनी पात्रता हो उस काम के करने पर प्रतिबंध का अर्थ है परिवर्जन।

किसी शूरवीर सिपाही को युद्धक्षेत्र में जाने से वंचित कर घर बैठने के लिए बाध्य करना या किसी विद्वान पंडित को विद्वत्सभा में भाग लेने से रोकने को भी परिवर्जन की संज्ञा दी गई है। इन तीनों प्रकारों में कारण रूप से अवहेलना या तिरस्कार की भावना है, अत: इन शब्दों को वध का पर्यायवाची माना गया। इसमें शरीरनाश का कुछ भी संबंध नहीं है। गुणहीन पुत्र की माता स्वयं अपने आपको पुत्रवती नहीं, बांझ समझे; इस कल्पना के पीछे भी 'कीर्तियस्य स जीवति' की ही धारणा थी। तात्पर्य यह कि उत्साहमय, सद्गुणसंपन्न और इस कारण गौरवास्पद जीवन जीना ही जीवित होने का लक्षण माना जाता रहा तथा निराशा से युक्त, अकर्मण्य और अपमानजनक जीवन को ही मृत्यु के समान समझा जाता रहा। यही तत्कालीन निश्चित धारणा थी।
और आज भी इस धारणा में कोई अंतर नहीं हुआ है। उसका शरीर श्वसनक्षम है एवं नित्यप्रति जो अन्नक्षय करता है, परंतु जिसमें आशा, कर्तृत्व या तेजस्विता का नामोनिशान न हो, ऐसे पुरुष को आज भी मृतवत् ही माना जाता है। व्यक्ति के संबंध में विचार करने पर इस धारणा का लाक्षणिक अर्थ ही अपने मन में मुख्यत: रहता है। परंतु समाज के संबंध में विचार करते समय भी जब हम इसी कसौटी पर उसे कसते हैं तब उक्त धारणा का लाक्षणिक अर्थ लगाने की आवश्यकता का भी हमें अनुभव नहीं होता। समाज-शरीर के विनाश की कल्पना भी असंभव सी होने के कारण स्वाभिमानी, आशायुक्त और तेजस्वी समाज हो तो वह जीवित एवं उक्त गुणों से हीन समाज सर्वत्र मृत माना जाता है।

आत्मज्ञान ही संजीवनी
इस प्रकार से जो समाज मृत है उसको गत-वैभव का स्मरण कराकर उसमें कर्तृत्व, साहस आदि सुप्त गुण जागृत करने से वह पुन: जीवित समाज कहला सकता है। यह बात इतिहास के पाठकों को अज्ञात नहीं है।
शुक्राचार्य द्वारा जिन स्थानों पर संजीवनी विद्या का प्रयोग किये जाने संबंधी वर्णन पुराणों में है, उनमें से एक कच का अपवाद छोड़कर, प्रत्येक बार उस विद्या का प्रयोग उन्होंने सामुदायिक रीति से किया है। कोई राक्षस नैसर्गिक रूप से मृत हुआ हो या दुर्घटना से या फिर आपस की झगड़ा-लड़ाई में ही, उसे संजीवनी की सहायता से शुक्राचार्य द्वारा जीवित कर दिया गया हो, ऐसा एक भी उल्लेख पुराणों में प्रापत नहीं है। यह बात ध्यान में रखें तो संजीवनी विद्या के संबंध में शंका करने का कारण ही शेष नहीं रहता।
परंतु किसी समाज के स्वाभिमान को जगाकर उसमें पराक्रमयुक्त तेजस्वी जीवन जीने का साहस उत्पन्न करना हो एवं उसे संजीवित करना हो तो इसके लिए आवश्यक है कि उस समाज का भूतकाल भी वैभवशाली और स्वाभिमानपूर्ण रहा है। जिन पर शुक्राचार्य संजीवनी विद्या का प्रयोग करते थे, वे राक्षस इस दृष्टि से भी सर्वथा योग्य ही थे। उस समय का उपलब्ध उनका भूतकालीन इतिहास पराक्रम एवं कर्तृत्व से परिपूर्ण था। पुराणों में वर्णन मिलता है कि वे बड़े निर्भय, अत्यन्त प्रयत्नवादी तथा स्वाभिमानी थे। प्रारंभ में पृथ्वी पर उन्हीं का शासन था। पश्चात् देवों ने उसमें हिस्सा मांगा। अत: सुर-असुरों के युद्ध हुए। पुराणों की इस उक्ति की पुष्टि वर्तमान शास्त्रों द्वारा भी की गई है।
भूगर्भशास्त्रियों के अनुसार आज जहां आर्यावर्त का उपजाऊ एवं मैदानी क्षेत्र है, वहां प्राचीन काल में समुद्र था और दक्षिण का पठार अफ्रिका से संलग्न था। पश्चात् आर्यावर्त का भूभाग ऊपर आया एवं वहां का पानी अफ्रिका की ओर फैल गया। इस कारण भारत नाम का एक नवीन महादेश प्रकट हुआ। हिमालय के ढलान पर रहने वाले लोगों ने दक्षिण के कृष्णवर्ण लोगों को पराभूत कर संपूर्ण देश पर अपना प्रभुत्व जमाने का प्रयत्न प्रारंभ किया। परंतु वे बहुसंख्यक थे तथा दक्षिण के पठारी प्रदेश में ही उनका राज्य था, अत: इस देश पर का प्रभुत्व आसानी एवं सरलता से भूल जाना उनके लिए कैसे संभव होता? उन्हें अपने वैभवशाली भूतकाल की ओर देखकर स्फूर्ति प्राप्त होती रहती है, इसकी कल्पना देवों को पहिले नहीं हो सकी। इस कारण एक बार पराभूत होकर भी वे अपनी सेना में नए लोग भर्ती कर दुगुने उत्साह से इतने शीघ्र कैसे तैयार हो जाते हैं, इस पर उन्हें बड़ा आश्चर्य होता था। इसको वे संजीवनी विद्या का प्रभाव मानते थे।
इसी रीति से अनेक वर्ष बीत गए तथा देवों, मानवों एवं राक्षसों ने भारतवर्ष को अपने मानबिन्दु का केन्द्र मानना प्रारंभ किया, इस कारण स्वाभाविक ही राक्षसों की गणना उनके श्रेष्ठ गुणों के कारण, देवयोनि में की जाने लगी और संजीवनी विद्या का प्रयोग अनावश्यक हो जाने के कारण बंद हो गया।
संजीवनी विद्या का जो लाक्षणिक अर्थ ऊपर की पंक्तियों में बताया गया है और साथ ही जिस प्रकार उसका ऐतिहासिक संबंध भी स्पष्ट किया गया है; उसी प्रकार इसी संदर्भ मे कच-कथा का भी स्पष्टीकरण करना आवश्यक है। अत: अब हम इसका विचार करें।

कच की कथा का लाक्षणिक अर्थ
शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या हस्तगत कर लेने के उद्देश्य से जब कच घर छोड़कर निकला तो देवों ने उसे गुप्त संकेत दिया कि शुक्राचार्य की कन्या देवयानी को प्रसन्न कर लेने से तुम्हारा काम बनेगा। कच ने यह बात ध्यान में रखी और वह शुक्राचार्य के घर पर पहुंच गया। उन्होंने उसे शिष्य के रूप में रख लिया। शिष्य के नाते कच ने गुरु-सेवा व्रत का निष्ठापूर्वक पालन प्रारंभ किया।
मधुर, मितभाषी, सेवापरायण होने के कारण वह शुक्राचार्य का स्नेह पात्र बन गया। परंतु देवयानी पर उसकी छाप उसके व्यसनहीन होने के कारण ही पड़ी। देवयानी की माता उसके बचपन में ही चल बसी थी। कच ने उस घर में रहना प्रारंभ किया तो एक समान आयु के मित्र-लाभ से उसे आनंद हुआ और कच को वह मन:पूर्वक चाहने लगी। कुछ दिन बीते तब कच के ध्यान में आया कि संजीवनी विद्या के संबंध में तो राक्षस कुछ बात तक नहीं करते। संभवत: वे इस बात को छिपाना चाहते हैं। ऐसा विचार कर राक्षसों का विश्वास संपादन करने हेतु वह उनके साथ अधिक घुलमिल कर रहने लगा। उनके साथ उसने मद्यपान भी प्रारंभ कर दिया। वह मानों उन्हीं का हो गया। ''मैं स्वर्गलोक का वासी हूं, कुछ विशेष उद्देश्य मन में रखकर यहां आया हूं,'' इसका भी मानों उसे पूर्ण विस्मरण हो गया। एक प्रकार से यह उसकी मृत्यु ही थी। मद्य की एक बूंद का भी स्पर्श न करने वाले इस विप्रकुमार द्वारा इतने थोड़े समय में ही, प्रत्येक बैठक में, जलसे मे एक के बाद एक मद्य के चषक रिक्त करते जाने का उस प्राचीनकाल में मृत्यु के अतिरिक्त और कोई अर्थ हो ही नहीं सकता था। इस कारण राक्षसगण मन ही मन अत्यधिक प्रसन्न थे। वे ऐसा सोचने लगे कि इस घटना से तो देवगुरु वृहस्पति की तो नाक ही कट गई।




प्रथम संजीवन
परंतु देवयानी पर कच के इस व्यवहार का विपरीत परिणाम हुआ। मन ही मन वह कच को भावी पति के रूप में वरण कर चुकी थी। फिर व्यसनहीन कच का एक मद्यपी में रूपान्तर हो जाना उसे कैसे रुचता। उसने स्वयं उसे सावधान करने का प्रयास किया। परंतु अपने नए मित्रों की बैठकों मे कच बिल्कुल ही रंग गया था। अंत में देवयानी ने यह बात आचार्य से कही। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र को स्वयं अपने घर शिष्य के रूप में रख लिया और उसने इस प्रकार आचरण प्रारंभ कर दिया, यह आचार्य को कदापि पसंद नहीं था। उन्होंने कच को अपने पास बुलाया एवं उसकी प्रताड़ना की। कच ने भी विचार किया कि सचमुच ही मद्यपान का अंत में भीषण परिणाम होगा। साथ ही उसने मन में यह विचार आया कि राक्षसों के साथ इतनी मित्रता करके एकरूप हो जाने पर भी अपना उद्देश्य साध्य होने की दृष्टि से तिल मात्र भी लाभ नहीं हुआ। इस विचार से वह भी सावधान हो गया। वह पुनश्च पूर्ववत् व्यवहार करने वाला निर्व्यसनी कच बन गया। राक्षसों का गप मारने का एक-एक अड्डा मानों एक एक लोमड़ी। इन अड्डों से कच एकरूप हो चुका था। अत: आचार्य द्वारा प्रताड़ना प्राप्त होने पर जैसे वह इन लोमड़ियों के पेट फाड़कर ही बाहर आ गया हो।
यद्यपि कच ने इस प्रकार से मद्यपान से छुट्टी पा ली तथापि उसके राक्षस मित्र उसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं थे। कच उनका साथ छोड़ने जा रहा है, यह ध्यान में आते ही उन्होंने उल्टे उसे कोसना और उसकी निंदा तथा मजाक उड़ाना प्रारंभ कर दिया। वे कहने लगे कि विप्रकुमार होकर भी मद्यपान करने के कारण वह अब भ्रष्ट हो गया है, उसका जीना अब व्यर्थ है और वह कायर है, उसे प्राणों का मोह हो गया है आदि। कुछ राक्षस कहने लगे कि वह देवयानी पर मुग्ध हो गया है, इसी से ऐसी उल्टी सीधी बातें कर रहा है। एक राक्षस ने तो उसे उसके मुंह पर स्पष्ट शब्दों में कह डाला कि जिस शुक्राचार्य को तू इतना पूजता मानता है, वे एक दिन भी मद्य के बिना रह नहीं सकते। अत: एक प्रकार से तुम्हारा मद्यपान-त्याग गुरुनिन्दा या गुरुद्रोह के समान ही है।
इस प्रकार के कटु वचन बार-बार सुनकर कच चिन्ताग्रस्त हो गया। उसकी हिम्मत पस्त हो गई। संजीवनी विद्या की प्राप्ति के संबंध में उसके मन में संदेह उत्पन्न हो गया। वह सोचने लगा कि अपशय एवं अपकीर्ति लेकर देवलोक में वापस जाने से क्या लाभ? ऐसी अशांत मन:स्थिति में समुद्र के किनारे वह अपना अधिकांश समय बिताने लगा। इसका परिणाम उसके शरीर पर होना स्वाभाविक था। मानो मृत्यु ने ही उसे ग्रसित कर डाला है। इस प्रकार उसकी मुद्रा फीकी पड़ गई। खाने-पीने में भी उसका मन नहीं लगता था। इसी स्थिति में कुछ दिन बीत जायें तो मन:ताप की पीड़ा से ग्रस्त होकर कच किसी दिन स्वयं ही समुद्र में कूद कर प्राणत्याग कर देगा, यह सोचकर राक्षस बहुत ही प्रसन्न हुए।
द्वितीय संजीवन
परंतु, देवयानी पर इसका बिल्कुल ही विपरीत परिणाम हुआ। कच की यह अवस्था देखकर वह चिंतित हो गयी। शुक्राचार्य के पास जाकर उसने कच की स्थिति से उन्हें पुन: अवगत कराया। देवयानी के मन का भाव आचार्य समझ चुके थे। परंतु वैसा कुछ प्रकट न करते हुए उन्होंने कच को फिर अपने पास बुलाया और कर्माकर्म मीमांसा का स्पष्ट विवेचन कर अंत में उससे कहा कि हाथ में लिया सत्कार्य कभी न छोड़ना और कभी निराश न होना, यही वास्तविक पुरुषार्थ का लक्षण है। उनके इस आश्वासन एवं उपदेश का कच पर योग्य और अपेक्षित परिणाम हुआ। उसमें फिर उत्साह का संचार हो गया। नैराश्य रूपी समुद्र में डूबा हुआ कच फिर होश में आ गया। मानों उसका जीवन उसे पुन: प्राप्त हो गया। देवयानी के कारण ही उसका यह दूसरी बार पुनर्जन्म हुआ।

उदर प्रवेश
इसके पश्चात् कच ने अपना संपूर्ण समय शुक्राचार्य के सान्निध्य में ही बिताना प्रारंभ किया। अब तो आचार्य को मद्यपान उसकी नजर से कैसे छूटता? परंतु कच की उपस्थिति में मद्यपान करना वे टालते थे। इस कारण प्रमुख राक्षसगण उनके पास जाते एवं महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत होती तो कच किसी काम के बहाने आचार्य बाहर भेज देते। कच ने जब देखा कि आचार्य के सान्निध्य में सदा रह सके, ऐसा और कोई मार्ग बचा नहीं है तो उसने पुन: मद्यपान प्रारंभ किया। वह मात्र आचार्य की बैठकों में एवं केवल प्रसाद स्वरूप् थोड़ा-सा मद्य लेने लगा। अब तक अपनी सेवा तथा चतुरता से उसने आचार्य का स्नेह संपादित कर लिया था। बीच के काल में उसके द्वारा मद्य का बहिष्कार कर दिये जाने के बाद से दोनों के बीच जो कुछ दूरी उत्पन्न हो गई थी वह भी अब नष्ट हो गई और वह फिर से आचार्य का विश्वासभाजन बन गया। मानो वह आचार्य के प्रत्यक्ष पेट में ही प्रवेश कर गया। उपनयन संस्कार की विधि में बताया गया है कि गुरु अपने शिष्य को तीन दिनों तक अपने गर्भ में धारण करता है। लाक्षणिक वर्णन तो प्रसिद्ध ही है। किसी का पूर्ण विश्वास संपादित करने के अर्थ में 'पेट में घुसना' वाक्प्रचार आज भी रूढ़ है। उस दृष्टि से 'कच का शुक्राचार्य के उदर में प्रवेश' में ये शब्द पढ़े जायें एवं मद्य के माध्यम से ही उसने उदर में प्रवेश किया, इस वर्णन की ओर ध्यान दिया जाय तो उक्त अर्थ के संबंध में किसी के मन में संशय उठने का कारण नहीं रहेगा।
इसके पश्चात् कच की उपस्थिति में ही राक्षसों की गुप्त मंत्रणाएं चलने लगीं। आचार्य भी कच के सामने ही राक्षसों का अभिमान जागृत करने वाले ओजस्वी तथा उग्र भाषण देते। कच इन बातों को बड़ी ही गंभीरतापूर्वक दत्तचित्त होकर सुनता। उसका वह मनन भी करता। उसका मद्यपान तो इन दिनों नाममात्र का ही था। परंतु कच ने थोड़ा सा ही क्यों न हो, मद्यपान प्रारंभ किया, इस कल्पना से ही देवयानी परेशान हो गई। मद्यपी पति के सहवास में उसे संपूर्ण वैवाहिक जीवन बिताना होगा, यह दुश्चिन्ता मन में उत्पन्न होने के कारण उसने फिर पिता के पास जाकर अपना दुखड़ा सुनाया।
शुक्राचार्य ने उसे समझाने का प्रयास किया। वे बोले 'कच अब कोई नवागंतुक तो रहा नहीं उसे यहां का सारा व्यवहार ज्ञात हो चुका है। इस अवस्था में मैं यदि उसे मद्यपान बंद करने को कहूं तो प्रथम मुझे भी वह बंद करना होगा, तभी इष्ट और अपेक्षित परिणाम होगा, परंतु इस वृद्धावस्था में मैं मद्य के बिना एक दिन भी जीवित नहीं रह सकता। मद्यपान करना अब मेरा स्वभाव तथा प्रकृति बन चुकी है। इन बातों का विचार करके तू सोच ले कि क्या करना उचित होगा।'
तब देवयानी अत्यंत दीन वाणी से कहने लगी- ''बाबा, मुझे तो आप एवं कच दोनों ही चाहिए। आपने तो बचपन से ही माता के समान मेरा पालन-पोषण किया है और अब आपके इस लाडली बेटी का भावी जीवन मंगलमय होने का समय निकट आ चुका है। फिर इस अड़चन से मुक्त होने का कोई मार्ग क्या आप ढूंढ नहीं निकालेंगे?''
शुक्राचार्य फिर पिघल गए। उन्होंने अपने मन में कुछ निश्चय किया। कच को पास बुलाकर उसे पुनश्च प्रारंभ से सब बातों का स्मरण करा दिया। उन्होंने कच से प्रश्न किया- ''यदि कोई यह कहे कि व्यसनहीन बृहस्पति पुत्र कच मेरे यहां रहकर मद्यपी बन गया तो क्या वह मेरी अपकीर्ति नहीं होगी?" प्रश्न सुनकर कच ने फिर एक बार भीषण प्रतिज्ञा की एवं ''अपने व्यवहार के कारण आचार्य की अपकीर्ति होने देने की अपेक्षा मैं प्राणत्याग भी सहर्ष स्वीकार करूंगा'' यह कहते हुए उसने आचार्य के चरणों पर मस्तक रखकर संकल्प किया कि इसके पश्चात् वह मद्य की एक बूंद का भी स्पर्श नहीं करेगा। शुक्राचार्य प्रसन्न हो गए। उन्होंने कच से कहा कि तुम्हारी सेवा एवं निष्ठा से मैं प्रसन्न हुआ हूं, अत: तुम्हें जो कुछ वरदान चाहिए, मांग लो।

संजीवनी - साक्षात्कार
कच ने अपना मनोगत स्पष्ट किया और कहा कि संजीवनी विद्या की प्राप्ति की एकमात्र लालसा को छोड़कर उसकी अन्य कुछ भी इच्छा नहीं है। शुक्राचार्य बोले- 'हे वत्स, संजीवनी की प्राप्ति तो तुम्हें बहुत पहले ही हो चुकी है। अपने सामर्थ्य एवं कर्त्तव्य का ज्ञान हो जाने पर उत्पन्न होने वाले आत्मविश्वास और आशावाद को ही संजीवनी कहा जाता है। इनकी प्राप्ति हो जाने पर कितनी भी असफलता मिले मनुष्य ध्येय-सिध्दि का प्रयत्न छोड़ता नहीं। इन राक्षसों का भूतकाल का इतिहास वैभवसंपन्न एवं पराक्रमयुक्त है। उसका पुनश्च स्मरण करा देने पर, पराजय के प्रसंग उपस्थित होने पर भी वे निराश नहीं होते, सदा उद्योगरत ही रहते हैं। यही बात देवलोक में संजीवनी के नाम से प्रसिद्ध है। इस संजीवनी का प्रयोग प्रत्यक्ष तुम पर भी मैंने तीन बार किया। क्या तुम्हारे ध्यान में यह बात नहीं आई? हे बृहस्पति-पुत्र! मैं भी तुम्हारा अत्यंत ऋणी हूं। यहां आने पर मद्यासक्त होकर पुनश्च तुम सावधान हो गए एवं पूर्णत: मद्यमुक्त हो गए। ब्राह्मण होने के कारण ही यह लोकोत्तर कर्म करना तुम्हारे लिए संभव हुआ। प्रत्यक्ष इन्द्र के लिए भी असंभव कर्म तुमने करके दिखा दिया। दो-दो बार तुम्हें मद्यपी बनना पड़ा था, वह मेरे कारण। इस मद्यपान का परिणाम कितना भयंकर तथा हानिकर होता है, इसकी पूर्ण कल्पना मुझे है। मैं भी ब्राह्मण हूं, इस बात का लगभग मुझे विस्मरण ही हो गया था। यहां तुम्हारे रहने से एक प्रकार से मुझे भी संजीवन ही प्राप्त हुआ है। मैं भी इस क्षण से मद्य का त्याग कर रहा हूं। इतना ही नहीं, यदि कोई ब्राह्मण मोहवश मद्यपान करे तो वह निंदा का पात्र है एवं मृत्यु के पश्चात् भी उसे सद्गति प्राप्त न हो, यह निर्बन्ध मैं डाल रहा हूं। यहां आने का तुम्हारा जो उद्देश्य था, वह अब सफल हो चुका है। अब चाहो तो तुम स्वर्गलोक वापस लौटकर इस विद्या का यथेच्छ उपयोग करो।''
कच बड़ा ही बुद्धिमान था। उसने आचार्य की मन:स्थिति एवं परिस्थिति अच्छी तरह से भांप ली थी। आचार्य ने मुझे शिष्य के रूप में ग्रहण कर ब्राह्मणत्व का जो आदर्श मेरे सामने रखा, उसी कारण मुझे इस विद्या की प्राप्ति हो सकी। ''आपकी यह उदारता निष्फल या व्यर्थ हुई, ऐसा अनुभव करने का मौका मैं आपको कभी न दूंगा।'' यह कहते हुए उसने आचार्य से बिदा ली।

शुक्राचार्य का पुनरुज्जीवन
शुक्राचार्य ने कच को मद्यमुक्त करने के लिए स्वयं वृद्धावस्था में भी मद्य पान-त्याग कर संकल्प लेकर मानों मृत्यु का ही आह्वान किया। उनके इस कृत्य को ध्यान में रखकर कच ने उनमें भी ब्राह्मणत्व का अभिमान जागृत किया एवं आमरण उन्हीं का शिष्यत्व कायम रखने का संकल्प घोषित किया और शुक्राचार्य में भी स्वजीवन सफल करने की भावना उत्पन्न करके मानों कच ने उन्हें मद्य के बिना भी जीवन धारण करने का सामर्थ्य प्राप्त करा दिया।
अपने घर वापस लौटने की अनुमति आचार्य से प्राप्त करके देवयानी से बिदा लेने कच उसके पास गया। तब देवयानी ने अपना मनोगत स्पष्ट रूप से कच के सम्मुख रखा। कच ने पूर्ण निर्विकार वृत्ति से दृढ़निश्चय के स्वर में उससे कहा कि ''गुरु-कन्या प्रत्यक्ष बहन के समान होती है, अत: मेरे द्वारा ऐसा अयोग्य और अधर्म्य व्यवहार नहीं हो सकता।'' यह सुनते ही देवयानी आपे से बाहर हो गई। क्रोधित होकर वह अनाप-शनाप बातें कहकर कच को कोसने लगी। उसने कहा -'हे कच, आज तक तुम यहां जीवित रह सके, वह मात्र मेरे कारण ही। क्या तुम इसे भूल गए? संजीवनी की प्राप्ति तुम्हें आचार्य द्वारा हुई, वह भी मेरी ही मध्यस्थता का फल है। यह सब जानकर भी क्या जानबूझ कर तुम उस ओर दुर्लक्ष्य कर रहे हो? परंतु ध्यान रहे कि यह संजीवन विद्या देवलोक में काम नहीं आएगी, क्योंकि इन देवों का भूतकाल राक्षसों के अनुसार उज्ज्वल या वैभवपूर्ण और पराक्रमयुक्त नहीं है।''

शाप और अभिशाप
कच ने कुछ क्षण विचार कर कहा- 'राक्षसों का सारा भावी उत्कर्ष उनके उज्ज्वल भूतकाल पर निर्भर है, अत: उसके बल पर वे उछलकूद करें, यह स्वाभाविक ही है। यह भी सही है कि देवों को यह अनुकूलता प्राप्त नहीं है, अत: संभवत: संजीवनी विद्या का ऐसा उपयोग वे न भी कर सकें। परंतु देवों में बुद्धि है एवं 'बुद्धिर्यस्य बलम् तस्य' यह त्रिकालाबाधित सिद्धान्त है। अत: हमें 'भविष्यत् में उर्जितावस्था प्राप्त होगी ही' ऐसी दुर्दम्य आशा-आकांक्षा रखकर तदर्थ उद्योग करने में, अर्थात् संजीवनी का उपयोग सफलता से कर सकने में, कोई बाधा या अड़चन आने का कारण नहीं। हे गुरुपुत्री, तूने जिस प्रकार मुझे प्राप्त संजीवनी विद्या के भविष्यत् में उपयोग के संबंध में शंका प्रदर्शित की है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे भवितव्य के संबंध में अपना प्रामाणिक विचार तुम्हें बता रहा हूं। अत: तुम मुझ पर नाराज न होना। एक विशेष उद्देश्य मन में रखकर मैं यहां आया था। वह साध्य करके मैं अब वापस जा रहा हूं। तूने स्वयं ही मुझ पर अनंत उपकार किए हैं, उसके लिए मैं सर्वदा तुम्हारा ऋणी रहूंगा। परंतु एक बात ध्यान में रहे कि अपने किये सुकृत्य या उपकारों की वाच्यता स्वमुख से करना सज्जनों को शोभा नहीं देता। दूसरी बात यह है कि शास्त्रों ने विधि-निषेध एवं मर्यादाओं की जो व्यवस्था बताई है, उसके विपरीत कर्म करने का आग्रह तू मुझ से कर रही है। यह तुम्हारा व्यवहार विप्र-कुलोचित नहीं। अत: मुझे ऐसा लगता है कि विप्रकुमार से विवाह करने का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त नहीं होगा।
इतना कहकर अपनी सफलता प्रसन्न हास्य द्वारा मुख पर झलकाते हुए कच घर की ओर चल पड़ा। वह स्वर्गलोक पहुंचा तो देवों की सभा में उसका बड़ा सत्कार हुआ तथा यज्ञ में हविर्भाग लेने का अधिकार भी उसे प्राप्त हो गया।

शर्मिष्ठा का समर्पण
फिर अनुकूल समय पाकर देवों ने राक्षसों पर चढ़ाई करने की तैयारी की। कच के मुख से वृषपर्जन्य के राज्य की सारी परिस्थिति वे सुन चुके थे। उस जानकारी के आधार पर देवों ने वृषपर्जन्य की कन्या शर्मिष्ठा एवं शुक्रकन्या देवयानी में कलह उत्पन्न करा दिया। अपनी कन्या के अपमान से शुक्राचार्य क्रोधित हो गये और राक्षसों का त्याग करने के लिए उद्यत हुए। परंतु शर्मिष्ठा ने देवयानी का दासत्व स्वीकार कर लिया और अपनी समाज संबंधी कर्तव्यनिष्ठा प्रकट करके स्वजाति को संकटमुक्त किया। यह कथा भी प्रसिद्ध है।

सच्ची संजीवनी

एक बार शरीर मृत होने पर यदि उसमें पुनश्च प्राणसंचार करने की सामर्थ्य संजीवनी विद्या में होती तो ऐसी संजीवनी विद्या सीखकर जबकि कच स्वर्गलोक लौटा था, देवों को उक्त प्रकार की कूटनीति का सहारा लेने की आवश्यकता ही नहीं होती। वे राक्षसों पर सीधा-सीधा आक्रमण करते। मृत राक्षसों को शुक्राचार्य एवं मृत देवों को कच या उसका कोई शिष्य जीवित करता, यही क्रम चलता रहता। परंतु देवों ने ऐसा कुछ न करके कूटनीति का ही सहारा लिया। इसका स्पष्ट अर्थ यही है कि संजीवनी विद्या मृत शरीर को फिर से सजीव करने वाली या चैतन्य देने वाली विद्या नहीं है अपितु उसका जो स्वरूप यहां वर्णित है, वही सत्य है। उसका यही अर्थ लेने से कच-कथा के वर्णन से उसकी संगति बैठती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. kitni gyaanvrdhk post hai ,kitne vistaar se sab smjhaya kya hai .....shukriyaa aap ka, pahli baar blog pr aana hua,aur is post ko padh kar aana saarthk bhi hua....

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  2. बहुत लाजवाब पोस्ट है लेकिन सच्चाई को मई अभी भी खोज रहा हु धन्यवाद ऐसी रिसर्च भरी पोस्ट के लिए

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